आज से शुरू हो रहा है होलाष्टक

आज से शुरू हो रहा है होलाष्टक

शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन के आठ दिन पूर्व होलाष्टक लग जाता है।
होली की सूचना होलाष्टक से प्राप्त होती है। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से लेकर होलिका दहन तक के समय को धर्मशास्त्रों में होलाष्टक का नाम दिया गया है।
इसके अनुसार होलाष्टक लगने से होली तक कोई भी शुभ संस्कार संपन्न नहीं किए जाते।

16 संस्कारों पर रोक

होली के एक सप्ताह पहले शुरू होकर आठ दिन तक माने जाने वाले इस होलाष्टक काल को अशुभ मानने की मान्यता के कारण आठ दिन तक कोई भी शुभ कार्य को करने की मनाही है, इसलिए शास्त्रीय मान्यता के अनुसार 16 संस्कारों में से कोई भी संस्कार नहीं किए जाते है।
16 संस्कार के अलावा अन्य जो भी आवश्यक कार्य होते हैं वे किए जा सकते है। सोना-चांदी खरीदना या इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम, कार, बाइक खरीदे जा सकते हैं, ये 16 संस्कारों के अंतर्गत नहीं आते बल्कि घर-परिवार की जरूरी चीजें हैं।

ये हैं 16 संस्कार

1- गर्भाधान, 2 – पुंसवन 3 – सीमन्त 4 – जात कर्म 5 -नामकरण
6 -निष्क्रमण 7 – अन्नप्राशन 8 – मुंडन 9 – विद्या आरंभ 10 – कर्णवेध 11 – यज्ञोपवीत 12 -वेद आरंभ 13 – केशातं 14 – समावर्तन 15 – विवाह 16 – अंत्येष्ठि
होलाष्टक के दिन से 16 संस्कार सहित शुभ कार्यों पर रोक लग जाएंगे फिर ये शुभ कार्य धुलेण्डी ( रंगोत्सव ) के बाद ही शुरू होंगे।

छत्तीसगढ में मान्य नही होकाष्टक

पुराणों के मतानुसार होलाष्टक मुख्य रूप से रावी, सतलज, सिंधु नदी के मध्य का भाग था। कभी यह क्षेत्र राजा हिरण्यकश्यपु का राज्य था। इस कारण से पंजाब और उत्तरी भारत में ही होलाष्टक माना जाता है।
यह मध्यभारत में मान्य नहीं है। शास्त्रों में वर्णित है कि जिस स्थान पर हिरण्यकश्यपु द्वारा होलिका के माध्यम से प्रह्लाद को जलाकर मारने का असफल प्रयास किया गया उस समय से ही हिरण्यकश्यपु के राज्य में ही होलाष्टक मनाए जाने की परंपरा शुरू हुई।
मान्यता है कि होली के पहले के आठ दिनों अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक प्रहलाद को काफी यातनाएं दी गई थीं। यातनाओं से भरे उन आठ दिनों को ही अशुभ मानने की परंपरा बन गई। हिन्दू धर्म में किसी भी घर में होली के पहले के आठ दिनों में शुभ कार्य नहीं किए जाते।

होलाष्टक काल को क्षेत्र विशेष में ही महत्व दिया जाता है। छत्तीसगढ़ में होलाष्टक मानने की बाध्यता नहीं है। चूंकि अन्य प्रांतों के लोग कई पीढ़ियों से छत्तीसगढ़ में रह रहे हैं, इसलिए वे अपनी पीढ़ियों के रीतिरिवाज का पालन करते हैं और संभवत: इसीलिए छत्तीसगढ़ में होलाष्टक मानने की परंपरा आरंभ हो गयी है। होलाष्टक काल को मानना या न मानना यह श्रद्धालुओं की सोच पर निर्भर करता है। छत्तीसगढ़ से प्रकाशित पंचांग के अनुसार होलाष्टक को मानना जरूरी नहीं है।

क्यों मानते हैं होलाष्टक

पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के विरोधी राजा हिरण्यकश्यप अपनी प्रजा से अपनी पूजा करवाना चाहता था, जो भी विष्णु की पूजा करता राजा उसे मृत्यु दंड देता जिससे डर के मारे प्रजा राजा की पूजा करती थी। राजा के पुत्र प्रहलाद ने एक दिन देखा कि एक बिल्ली कुम्हार के कच्चे घड़े के बीच फंसी हुई थी और कुम्हार को इस बात का पता नहीं था उसने कच्चे घड़ों को पकाने के लिए आग लगा दी।
आग लगने के बाद जब बिल्ली के फंसे होने का पता चला तो बिल्ली को कैसे बचाया जाए यह नहीं सूझने पर कुम्हार ने सब कुछ भगवान विष्णु पर छोड़ दिया और जब आग की ज्वाला शांत हुई तो बिल्ली सकुशल निकल आई।
यह देखकर प्रहलाद को भगवान विष्णु पर विश्वास हो गया और वह भगवान की भक्ति करने लगा। जब राजा को इसका पता चला तो उसने अपने पुत्र को तरह-तरह की यातनाएं दी। राजा ने फाल्गुन पूर्णिमा पर प्रहलाद को अपनी बहन होलिका, जिसे अग्नि भी नष्ट नहीं कर सकती थी, का वरदान प्राप्त था।
उसकी गोद में बिठाकर अग्नि में जलवाया, लेकिन भगवान की कृपा से प्रहलाद जीवित बच निकला और होलिका जल गई। होलिका दहन के आठ दिन पहले तक प्रहलाद को दी जाने वाली यातना के कारण ही उन आठ दिनों को होलाष्टक के रूप में मनाया जाता है।

होलिका दहन स्थल की करेंगे पूजा

छत्तीसगढ की राजधानी रायपूर के प्राचीन श्री महामाया देवी मन्दिर परिसर पुरानी बस्ती में होलाष्टक के पहले दिन होलिका दहन किए जाने वाले स्थल पर , जहाँ बसन्त पंचमी के दिन विधि विधान से पूजन कर होळी दांड गडाई गयी रहती है उस जगह पर आज से सूखे उपले, सूखी लकड़ी, सूखी घास आदि को इकटठा किया जायेगा।  महामाया मंदिर में यह परंपरा अत्यन्त प्राचीन समय से आज तक निभाई जा रही है।

पंडित मनोज शुक्ला
महामाया मन्दिरम, रायपुर

7804922620

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