स्वप्न में आकर देवी ने डांटा, बलि न देने पर

स्वप्न में आकर देवी ने डांटा, बलि न देने पर

खेतुरी नामक गांव में एक ब्राह्मण रहता था। एक दिन उसके दो पुत्र हरिराम अचार्य तथा रामकृष्ण आचार्य पिता जी के आदेश पर देवी को बलि देने के लिए बकरी लेकर जा रहे थे। उन्हें ऐसा करते देख श्रील नरोत्तम ठाकुर जी ने उन्हें हिंसा के अशुभ परिणाम के बारे में समझाते हुए, भगवान के भजन की बात बताई। आपकी बात से वे दोनों इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने बकरी को छोड़ दिया और आपसे दीक्षा लेकर श्रीकृष्ण भजन का संकल्प लिया। इस कार्य से उनके पिता बहुत नाराज हुए। वे मिथिला से मुरारी नाम के एक विद्वान पंडित को ले कर आए ताकि वैष्णव सिद्धांत को गलत साबित कर सकें। किंतु हरिराम और रामकृष्ण नामक आपके दो शिष्यों ने ही गुरु-कृपा के बल पर उस पंडित की सारी बातों को शास्त्र के आधार पर गलत प्रमाणित कर दिया। इससे दुःखी होकर उन दोनों के पिता शिवानंद जी ने रात के समय देवी के आगे दुःख निवेदन किया। देवी ने उसे स्वप्न में डांटते हुए वैष्णवों के विरुद्ध आचरण करने से मना कर दिया।

इस प्रकार जब कई ब्राह्मण जैसे श्रीगंगानारायण चक्रवर्ती, इत्यादि आपके शिष्य होने लगे तो कई ब्राह्मणों ने मिल कर राजा नरसिंह के पास शिकायत लगाई कि नरोत्तम नीची जाति का होते हुए भी उच्च जाति के ब्राह्मणों पर जादू कर उनको शिष्य बना रहा है। उसको ऐसा कार्य करने से रोकना चाहिए। राजा के साथ परामर्श करने के बाद यह फैसला हुआ कि महादिग्विजयी पंडित श्रीरूपनारायण के द्वारा नरोत्तम ठाकुर को हराना होगा। यह सोच कर सब खेतुरी धाम की ओर चल पड़े। उधर श्रीरामचन्द्र कविराज और श्रीगंगानारायण चक्रवर्ती को जब ये सुनने को मिला कि राजा दिग्विजयी पंडित एवं पंडितों के साथ एक दिन कुमारपुर के बाजार में विश्राम करने के बाद फिर खेतुरी में आएंगे तो दोनों कुमारपुर के बाजार में कुम्हार और पान-सुपारी की दुकानें लगा कर बैठ गए।
उस शाम जब कुछ पंडित उनकी दुकानों पर आए तो श्रीरामचंद्र तथा श्रीगंगानारायण उनके साथ संस्कृत में बात करने लगे। दुकानदारों का ऐसा पांडित्य देख कर वे आश्चर्यचकित रह गए। बातों ही बातों में दोनों ने पंडितों के सारे तर्कों का खंडन कर दिया। जब यह बात राजा ने सुनी तो वह भी वहां आकर शास्त्रार्थ करने लगे। श्रीरामचन्द्र कवीराज और श्रीगंगानारायण चक्रवर्ती ने बातों ही बातों में उनके सारे विचारों का खंडन कर शुद्ध भक्ति सिद्धांतों की स्थापना कर दी। राजा और पंडित सामान्य दुकानदारों का ऐसा अद्भुत पंडित्य देखकर हैरान रह गए।
राजा को जब यह मालूम हुआ कि ये दोनों नरोत्तम ठाकुर के शिष्य हैं तो राजा ने पंडितों से कहा कि जिनके शिष्यों से ही आप हार गए, तो उनके गुरु के पास जाने से क्या होगा? जब शिष्य ऐसे अद्भुत हैं, तो जरा सोचो गुरु भला कैसे होंगे? बाद में राजा नरसिंह और रूप नारायण ने देवी के द्वारा स्वप्न में आदेश पाने पर श्रील नरोत्तम ठाकुर से क्षमा मांगी और श्रीराधा-कृष्ण के भक्त हो गए। श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी अपनी रचना ‘श्रीगौरपार्षद और गौड़ीयवैष्णवाचार्यों का संक्षिप्त चरितामृत’ में बताया है कि श्रील नरोत्तम ठाकुर जी श्रीकृष्ण लीला में चंपक मंजरी हैं। आपका आविर्भाव माघी पूर्णिमा को हुआ था।
ग्रंथराज श्रीमद् भागवतम् (12/13/16) के अनुसार, “सभी नदियों में सबसे श्रेष्ठ हैं गंगा, सभी भगवद्-स्वरूपों में सबसे श्रेष्ठ हैं श्रीकृष्ण, इसी प्रकार सभी वैष्णवों में सबसे श्रेष्ठ हैं शिव जी महाराज तथा सभी पुराणों में से श्रेष्ठ है श्रीमद् भागवतम्।”

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