ये टायर हैं बहुत खास, ऐसे रखें इनका ख्याल

ये टायर हैं बहुत खास, ऐसे रखें इनका ख्याल

भारत में रोजाना सैकड़ों सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि ज्यादातर दुर्घटनाओं का कारण आपकी गाड़ी के टायर होते हैं। हमारे देश में लोग कार या बाइक का इस्तेमाल तो खूब करते हैं लेकिन गाड़ी के टायरों के बारें में उन्हें जानकारी कम होती है। एक्सपर्टस कहतें है कि अगर गाडी़ के टायर का ख्याल रखा जाए तो आए दिन होने वाली दुर्घटनाओं में बड़ी संख्या में कमी देखने को मिलेगी। कंपनी जब कभी कोई गाड़ी डिजाइन करती है, उस वक्त गाड़ी के हिसाब से टायर का तय कर लिया जाता है। हमें कार या बाइक के टायर में ज्यादा बदलाव करने से बचना चाहिए। इसलिए टायरों के साथ कोई लापरवाही न करें आइए हम आपको टायरों की केयर से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं।

टायरों के बारे में जानें
किसी भी बाइक या कार के टायर अलग-अलग होते हैं और उसकी जानकारी टायर के साइड में लिखी रहती है। किस गाड़ी में कौन सा टायर लगेगा इस बाबत जानकारी आपको यहां से हासिल हो जाती है। उदाहरण के लिए किसी टायर के आगे पी लिखा रहता है। ‘पी’ का मतलब होता है टायर पैसेंजर कार का है। मान लिजिए किसी टायर पर यह नंबर P215/55R15 90S अंकित है। इसका मतलब है कि टायर की चौड़ाई 215एमएम है, 55 इसका ऑस्फेक्ट रेसियो है जबकि आर का मतलब रेडियल और 15 रिम का व्यास है।

यहां पर 90 लोड इंडेक्स का सूचक है यानी कि यह बताता है कि इस टायर पर कितना बोझ उठाया जा सकता है। अंत में लिखा एस इसके स्पीड रेटिंग को बताता है। हर टायर के गति की अधिकतम सीमा होती है। इसके लिए ए1 से लेकर वाई तक की रेटिंग दी जाती है। ए1 रेटिंग वाले टायर 5 किमी प्रति घंटा और वाई रेटिंग वाले टायर 300 किमी प्रति घंटा की अधिकतम रफ्तार पर चल सकते हैं। अगर इन सूचकों का सही से पालन नहीं किया जाएगा तो टायर की उम्र बहुत कम हो जाएगी।
क्यों हैै ये टायर खास

विभिन्न प्रकार के टायर
टायर मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं। एक ट्यूब वाला और दूसरा ट्यूबलेस टायर होता है। आजकल ट्यूबलेस टायर अधिक चलन में है। ट़यूब वाले टायर आमतौर पर कम कीमत के होते हैं। ट्यूब और टायर के बीच होने वाले फ्रिक्शन की वजह से ये टायर जल्दी गर्म हो जाता है और इसीलिए ऐसे टायर पंक्चर भी जल्दी होते हैं। यही वजह है कि ट़यूब वाले टायर अब बाजार से गायब होते नजर आ रहे हैं। ट़यूबलेस टायर कई फायदे होते हैं। ट्यूबलेस टायर से सड़क पर बेहतर ग्रिप और कंट्रोल मिलता है। ट्यूबलेस टायर का बड़ा फायदा यह है कि अगर सफर के दौरान कभी टायर पंक्चर भी हो जाए तो इसमें से हवा तुरंत नहीं निकलती, इसलिए सफर बाधित नहीं होता है। स्टील रिम पर भी ट्यूबलेस टायर्स अच्छी परफॉमेंर्स देते हैं।

कब बदलें टायर
समान्य तौर पर 40 हजार किमी चलने के बाद टायर बदल देना चाहिए। अगर आपको इसके बाद भी लगता है कि टायर ठीक हालत में है तो इनका इस्तेमाल 10 हाजार किमी तक और किया जा सकता है। मतलब आप 50 हजार किमी तक इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। किसी टायर का प्रयोग इसे ज्यादा दूरी के लिए करना खुद की सेफ्टी दाव पर लगाने जैसा है। वाहन नियमों के की मानें तो, टायर पर बने खांचे (ट्रेड) की गहराई 1ध्6 मिमी रह जाए तो टायर बदल दिया जाना चाहिए। जो लोग गाड़ी का काफी कम प्रयोग करते हैं, उन्हें भी पांच साल के बाद हर साल टायरों की जांच कराते रहना चाहिए। अगर आपने 10 साल से गाड़ी नहीं चलाई है इस अवस्था में भी टायरों को बदल दें।

कैसे रखे अपनी गाड़ी के टायर का ख्याल
हर महीने गाड़़ी के टायर का प्रेशर जरूर चेक कराएं। टायर में हवा उतनी ही रखें जितनी निर्धारीत की गई हो। टायर में कम या ज्यादा हवा होने के कारण टायर जल्द घिसेंगे। कंपनी यह भी तय करती है कि कम लोड और ज्यादा लोड पर टायर में कितना प्रेशर होना चाहिए। हर 5000 किलोमीटर पर वील रोटेशन और अलाइनमेंट कराने से टायर की लाइफ बढ़ जाती है। टायरों के ट्रेड में फंसे कंकड़-पत्थर, कील-कांटे भी समय-समय पर निकालें। टायर साफ करने के लिए पेट्रोलियम बेस्ड डिटरजेंट या केमिकल क्लीनर का प्रयोग न करें।

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