Movie Review: ‘बैंक चोर’ में सस्ती चुटकुलेबाजी की धूम

कहानी: 2 स्टार

एक्टिंग: 2.5 स्टार

सिनेमेटोग्राफी: 3 स्टार

म्यूजिक: 1.5 स्टार

सिर्फ दर्शक ही ‌डिमांड नहीं करते कि कैसी फिल्म देखना चाहते हैं, फिल्में भी डिमांड करती हैं कि उन्हें कैसे देखा जाए। कुछ फिल्में सजग होकर देखने की होती है, कुछ आंखें बंद करके। कुछ लोरी जैसा फील देकर सुला देती हैं और जागने पर जहां सोए थे, वहीं से मिलती है। थोड़ी फिल्में सोचने पर मजबूत करती हैं और ज्यादातर कहती हैं कि दिमाग को सिनेमाहॉल के बाहर ही रखें।
बैंक चोर आखिरी श्रेणी की फिल्म है। टीवी पर आए दिन चलने वाले चुटकुलेबाजी के कार्यक्रमों से आप ऊबते नहीं हैं तो बैंक चोर देख सकते हैं। यह चुटकुलेबाजी की ‘धूम’ है। कोई चोर, कोई सिपाही। मराठी माणुस चंपक (रितेश देशमुख) को पिता की बायपास सर्जरी के लिए धन चाहिए। जो नहीं है। शॉर्टकट मैसेज यह कि बैंक को लूटा जाए। वह दो किसी काम के लायक नहीं टाइप चोरों, गेंदा-गुलाब के साथ मिलकर एक बैंक में जा पहुंचता है।

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