पक्षी संरक्षण और आर्द्रभूमि पर विमर्श, पर्यावरण जागरूकता की नई पहल

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पक्षी संरक्षण और आर्द्रभूमि पर विमर्श, पर्यावरण जागरूकता की नई पहल

रायपुर, 28 मार्च 2026 : वन एवं जलवायु परिवर्तन छत्तीसगढ़ वेटलैंड ऑथोरिटी तथा छत्तीसगढ़ राज्य जैव विविधता बोर्ड के संयुक्त तत्वावधान में बिलासपुर वनमंडल द्वारा वन चेतना केंद्र, सकरी में *‘आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी एवं पक्षी संरक्षण’* विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का सफल एवं प्रभावी आयोजन किया गया।

आर्द्रभूमि (Wetlands) पारिस्थितिकी तंत्र का आधार हैं, जो जल शोधन, बाढ़ नियंत्रण और जैव विविधता, विशेषकर प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण हैं। कार्यशाला में पर्यावरण संरक्षण, आर्द्रभूमियों के महत्व, जैव विविधता संवर्धन तथा पक्षी संरक्षण जैसे समसामयिक विषयों पर विशेषज्ञों द्वारा गहन एवं सारगर्भित विमर्श किया गया।

कार्यक्रम में विशेष रूप से छत्तीसगढ़ के प्रथम रामसर साइट *कोपरा जलाशय* के महत्व, उसकी पारिस्थितिकीय विशिष्टताओं तथा संरक्षण की आवश्यकता पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया, जो राज्य के लिए गौरव एवं जैव विविधता संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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कार्यक्रम का शुभारंभ वनमंडलाधिकारी नीरज यादव के स्वागत उद्बोधन में कार्यशाला की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए आर्द्रभूमियों के संरक्षण को वर्तमान समय की अनिवार्य आवश्यकता बताया। इसके पश्चात मुख्य वन संरक्षक, बिलासपुर वन वृत्त मनोज पांडे ने अपने प्रेरक संबोधन में आर्द्रभूमियों की पारिस्थितिकीय उपयोगिता, जैव विविधता संरक्षण में उनकी भूमिका तथा जलवायु संतुलन में उनके योगदान को विस्तारपूर्वक रेखांकित किया।

कार्यशाला के सत्रों में विभिन्न विषय विशेषज्ञों द्वारा ज्ञानवर्धक व्याख्यान प्रस्तुत किए गए। गुरु घासीदास विश्वविद्यालय की प्रो. गरिमा तिवारी ने *‘वेटलैंड पारिस्थितिकी का समग्र अवलोकन’* विषय पर आर्द्रभूमियों की संरचना, कार्यप्रणाली एवं जैव विविधता संरक्षण में उनकी भूमिका को वैज्ञानिक एवं सरल दृष्टिकोण से समझाया।

प्रकृति-प्रेमी एवं वन्यजीव फोटोग्राफर सिरीश डामरे ने *‘कोपरा क्षेत्र के इतिहास एवं सांस्कृतिक विरासत’* पर प्रकाश डालते हुए स्थानीय परंपराओं और प्राकृतिक संसाधनों के अंतर्संबंध को स्पष्ट किया। सौरभ तिवारी ने *‘कोपरा ग्राम: समुदाय, संस्कृति एवं स्थानीय आजीविका’* विषय के माध्यम से आर्द्रभूमि आधारित ग्रामीण जीवन एवं आजीविका का सजीव चित्र प्रस्तुत किया।

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द्वितीय सत्र में अनुराग विश्वकर्मा ने *‘आर्द्रभूमि और उनका महत्व’* विषय पर विस्तृत जानकारी देते हुए इनके संरक्षण हेतु व्यावहारिक उपाय सुझाए।

गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के वरिष्ठ शोधार्थी अनिमेष शुक्ला ने *‘शहरीकरण एवं प्रदूषण से आर्द्रभूमियों पर खतरे’* विषय पर अपने विचार रखते हुए संरक्षण हेतु सुदृढ़ नीति एवं जनभागीदारी की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी, पक्षियों के व्यवहार, उनके आवास एवं संरक्षण के विविध पहलुओं पर भी प्रकाश डाला।

शोधार्थी नरेंद्र साहू ने *‘मैक्रोफाइट्स एवं कोपरा आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी में उनका महत्व’* विषय पर जलवनस्पतियों की पारिस्थितिकीय भूमिका को विस्तार से समझाया, जिससे कोपरा रामसर साइट के संरक्षण की वैज्ञानिक समझ को बल मिला।

छत्तीसगढ़ वेटलैंड ऑथोरिटी की वरिष्ठ वैज्ञानिक नीतू हरमुख जी ने *‘प्रकृति एवं पर्यावरण के प्रति जिज्ञासा और जागरूकता’* विषय पर युवाओं में पर्यावरणीय चेतना विकसित करने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। साथ ही पर्यावरणविद् संतोष खंडेलवाल ने स्थानीय स्तर पर जागरूकता एवं प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग को अत्यंत आवश्यक बताया।

कार्यक्रम में गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के वानिकी, वन्यजीव एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग के शोधार्थियों एवं छात्र-छात्राओं की उल्लेखनीय एवं सक्रिय सहभागिता रही। प्रतिभागियों ने विशेषज्ञों के साथ संवाद स्थापित कर अपने ज्ञान में वृद्धि की तथा आर्द्रभूमि संरक्षण के व्यावहारिक पहलुओं को समझा। कार्यशाला में कुल 70 विद्यार्थियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

समापन अवसर पर उपवनमंडलाधिकारी मरई ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए कार्यशाला की कार्यवाही का संक्षिप्त विवरण दिया तथा सभी अतिथियों, विशेषज्ञों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

इस सफल आयोजन में शहर के पर्यावरणविदों, पक्षी प्रेमियों तथा वन विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों का सराहनीय योगदान रहा। यह कार्यशाला आर्द्रभूमि संरक्षण, विशेषकर कोपरा रामसर साइट के संरक्षण एवं पक्षी सुरक्षा के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं सार्थक पहल सिद्ध हुई।

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