रविवार, मई 22, 2022

6 एकड़ जमीन से शुरू की किसानी आज 300 एकड़ में खेती

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बाराबंकी. देश में खेती-किसानी में क्या संभावनाएं हैं, इसे बाराबंकी के एक किसान रामसरन वर्मा ने बखूबी सबके सामने पेश करके एक मिसाल कायम की है. वर्मा का काम आज इस बात का जीता-जागता सबूत है कि खेती से न केवल किसानों की माली हालत सुधर सकती है, बल्कि मजदूरों को भी उनके गांव में रोजगार दिया जा सकता है.

बाराबंकी के दौलतपुर गांव के रामसरन वर्मा ने मैट्रिक करने के बाद 1980 में हल-बैलों की मदद से अपनी पुश्तैनी 6 एकड़ जमीन पर धान और गेहूं की परंपरागत खेती से शुरुआत की. खेती करने के कुछ दिनों बाद ही रामसरन वर्मा की समझ में आ गया कि धान और गेहूं की खेती से कुछ खास फायदा नहीं हो रहा है. उन्होंने सुन रखा था कि फल और सब्जियों की खेती करने वाले किसानों की आमदनी ज्यादा होती है. खासकर उन्हें केला किसानों के बारे में जानने की बहुत उत्सुकता थी.

केला किसानों की हालत की जानकारी लेने के लिए रामसरन वर्मा महाराष्ट्र चले गए. वहां उन्होंने केला किसानों की खेती देखी. उन्हें एक बात यह समझ में आ गई कि केले की खेती करने वाले किसान ज्यादा समृद्ध हैं. वापस लौटकर रामसरन वर्मा ने केले की खेती करना शुरू किया. शुरुआत में रामसरन वर्मा ने 1 एकड़ से केले की खेती करना शुरू किया. जिसमें उन्हें मुनाफा दिखा.

फिर धीरे-धीरे उन्होंने अपने केले की खेती के क्षेत्रफल को बढ़ाना शुरू किया. 1990 में टिश्यू कल्चर से केले की खेती की नई तकनीक बाजार में आ गई. रामसरन वर्मा ने उसे भी अपनाया और मुनाफा बटोरा. इस तरह से 6 एकड़ की खेती करने वाले रामसरन वर्मा धीरे-धीरे 300 एकड़ की खेती करने वाले एक ऐसे किसान के रूप में उभर कर सामने आए, जिन्हें छह राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है. खेती में योगदान के लिए रामसरन वर्मा को 2019 में पद्मश्री भी हासिल हो चुका है.

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