Revealed in new book: ललित मोदी ने कोच्चि फ्रेंचाइजी के दस्तावेजों में हस्ताक्षर के लिए किया था अंत तक विलंब

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नयी दिल्ली: नई किताब में खुलासा किया गया है कि इंडियन प्रीमयर लीग के संस्थापक ललित मोदी ने अब भंग हो चुकी फ्रेंचाइजी कोच्चि टस्कर्स केरल के दस्तावेजों में हस्ताक्षर के लिए 2010 में अंत तक विलंब किया था और भारतीय क्रिकेट बोर्ड (बीसीसीआई) के तत्कालीन अध्यक्ष शशांक मनोहर के आधी रात के बाद आए फोन के बाद ही वह झुके थे।

लेखक-पत्रकार बोरिया मजूमदार की किताब ‘मैवरिक कमिश्नर: द आईपीएल-ललित मोदी सागा’ के अनुसार कई बैठक हुई लेकिन हर बार ललित कागजातों में बदलाव के लिए कहते या आईपीएल मैच के लिए बेंगलुरू चले जाते। मजूमदार ने ‘संस्थान बनाम व्यक्ति’ शीर्षक के अध्याय में लिखा, ‘‘मुझे बताया गया था कि कोच्चि प्रतिनिधिमंडल फ्रेंचाइजी करार पर हस्ताक्षर लेने के लिए 10 अप्रैल 2010 को मुंबई के फोर सीजन्स होटल में ललित से मिला जहां वह रुके हुए थे। ’’

उन्होंने लिखा, ‘‘एक हफ्ते में कई बैठक हो चुकी थी और हर बार वह दस्तावेज पर हास्ताक्षर से इनकार करके कुछ बदलाव करने के लिए कहता।’’ मजूमदार ने लिखा, ‘‘बीसीसीआई के वकील को स्पष्ट निर्देश थे कि फ्रेंचाइजी दस्तावेज पर उनके हस्ताक्षर कराने हैं और इस मामले को खत्म करना है। लेकिन उसका पाला ललित से पड़ा था। एक बार फिर उसने उसे कुछ बदलाव करने के लिए कहा और इसके बाद ही हस्ताक्षर की बात कही।’’

कोच्चि टस्कर्स केरल 2010 में टूर्नामेंट से जोड़ी गई दो नई टीम में से एक थी। इसने 2011 में सिर्फ एक सत्र में हिस्सा लिया और वार्षिक बैंक गारंटी का भुगतान करने में नाकाम रहने के बाद इसके अगले साल उसका अनुबंध रद्द कर दिया गया। भारत से भागकर अभी लंदन में निर्वासित होकर रह रहे ललित बारे में मनोहर ने किताब में कहा, ‘‘हां, ऐसा हुआ था।

मैंने बोर्ड की वकील को उससे हस्ताक्षर कराने और इस मामले को खत्म करने को कहा था। यह सामान्य सी बात थी। लेकिन उसने मुझे वापस फोन किया और कहा कि ललित ने उसे दस्तावेज में बदलाव करने को कहा है और उसके होटल पहुंचने से पहले ही वह बेंगलुरू (आईपीएल मैच के लिए) रवाना हो गया। ’’

उन्होंने कहा, ‘‘मैंने उसे कहा कि वह कोच्चि के प्रतिनिधियों को बेंगलुरू जाने का निर्देश दें और वहां यह काम कराएं। काफी समय लग रहा था और यह हताशा भरा होता जा रहा था।’’ आईपीएल के 2010 के सत्र के बाद बीसीसीआई ने दुर्व्यवहार, अनुशासनहीनता और वित्तीय अनियमितता का आरोप लगाकर ललित को निलंबित कर दिया। समिति ने इसके बाद उसे इन आरोपों में दोषी पाया और बीसीसीआई ने उस पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया।

कोच्चि टीम के एक सह मालिक के अनुसार ललित ने उन्हें ‘पागलपन’ की हद तक पहुंचा दिया था। सह मालिक ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर बताया, ‘‘उसके हस्ताक्षर के बिना चीजें आगे नहीं बढ़ती और हमारा सर्वश्रेष्ठ विकल्प यही था कि हम उसके पीछे पड़े रहें और किसी तरह यह काम कराएं।’’

बेंगलुरू जाने का भी कोई फायदा नहीं हुआ। आईपीएल के पूर्व आयुक्त ने उन्हें आईपीएल मैच खत्म होने तक होटल में इंतजार करने को कहा और लगभग आधी रात के समय लौटने पर उन्हें कहा कि वह दस्तावेज में और बदलाव चाहते हैं। बोर्ड, विशेषकर मनोहर ललित की विलंब करने की रणनीति से आजिज आ चुके थे और उन्होंने उसी रात हस्ताक्षर करने का आदेश दिया।

मनोहर ने कहा, ‘‘मैं उठा हुआ था क्योंकि मुझे पता था कि समस्या हो सकती है। ललित से निपटना आसान नहीं था और इसकी उम्मीद थी। तब मैंने निर्णायक रुख अपनाने का फैसला किया। मैंने ललित को फोन किया और उसी रात दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने को कहा, वह अगर ऐसा नहीं करता तो मैं सचिव एन श्रीनिवासन से आग्रह करता कि वह अगली सुबह दस्तावेज पर हस्ताक्षर करें।’’ बीसीसीआई के संविधान के अनुसार सचिव को ऐसा करने का अधिकार था। बीसीसीआई के दबाव और कोई अन्य विकल्प नहीं होने की स्थिति में ललित ने अंतत: 11 अप्रैल को सुबह तीन बजे कोच्चि फ्रेंचाइजी के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए।

इसी दिन मोदी ने ट्वीट करते हुए खुलासा किया कि तत्कालीन विदेश मामलों के राज्य मंत्री शशि थरूर की मित्र और बात में पत्नी बनी दिवंगत सुनंदा पुष्कर की रेनदोवु स्पोर्ट्स वर्ल्ड में हिस्सेदारी है जो कोच्चि टीम के सह मालिकों में शामिल थी। इस विवाद के बाद अंतत: ललित को बीसीसीआई से बाहर का रास्ता देखना पड़ा और थरूर को केंद्र सरकार से मंत्री के रूप में इस्तीफा देना पड़ा।

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