लघु धान्य रागी से समृद्धि की ओर बढ़ती शकुन बाई कुजांम

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लघु धान्य रागी से समृद्धि की ओर बढ़ती शकुन बाई कुजांम

रायपुर, 04 अप्रैल 2026 : राज्य और केन्द्र सरकार लघु धान्य जैसे रागी, कोदो, कुटकी जैसे फसलों को बढ़ावा देने किसानों विशेष अभियान चलाकर जागरूक कर रही है, इसी कड़ी में धमतरी विकासखंड के ग्राम उरपुटी की महिला कृषक शकुन बाई कुजांम लघु धान्य फसल रागी का उत्पादन कर प्रगतिशील किसानों की श्रेणी में शामिल हो गई है।

गौरतलब है कि कुंजाम ने परंपरागत खेती से आगे बढ़ते हुए नवाचार और वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाकर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत की है। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने मेहनत, लगन और कृषि विभाग के मार्गदर्शन से सफलता की एक प्रेरणादायक मिसाल प्रस्तुत की है। शकुन बाई के पास कुल 7 एकड़ कृषि भूमि है, जो ट्यूबवेल से सिंचित है। उनके पास ट्रैक्टर, रोटावेटर, सीड ड्रिल, मल्टी क्रॉप थ्रेसर एवं रीपर जैसे आधुनिक कृषि उपकरण उपलब्ध हैं। उनके परिवार के 5 सदस्य खेती में सक्रिय सहयोग करते हैं, जिससे कृषि कार्य व्यवस्थित ढंग से संचालित हो पाता है।

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शकुन बाई ने बताया कि रबी सीजन में 3 एकड़ क्षेत्र में लघु धान्य फसल रागी (छत्तीसगढ़ रागी-2) की खेती की। उन्होंने बीजोपचार के लिए बीजामृत, तथा खाद के रूप में वर्मी कम्पोस्ट, डीएपी, पीएसबी एवं केएसबी का उपयोग किया। वैज्ञानिक विधियों से की गई खेती के परिणामस्वरूप उन्हें 28.50 क्विंटल उत्पादन प्राप्त हुआ। कुछ वर्ष पहले बीज उत्पादन कार्यक्रम के अंतर्गत रागी की खेती से उन्हें 5200 रुपये प्रति क्विंटल की दर से कुल 1,48,200 रुपये की आय हुई। इस उत्पादन में कुल लागत 27,000 रुपये रही, जिससे उन्हें 1,21,200 रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ।

उल्लेखनीय है कि कृषि विभाग द्वारा संचालित आत्मा कार्यक्रम के तहत उन्हें निरंतर मार्गदर्शन एवं तकनीकी सहयोग प्राप्त हुआ, जिससे उन्होंने फसल चक्र परिवर्तन और लघु धान्य फसलों की खेती को सफलतापूर्वक अपनाया। फसल कटाई के बाद वे ग्रीष्मकालीन जुताई भी करती हैं, जिससे भूमि की उर्वरता बनी रहती है। इस प्रेरक सफलता की जानकारी मिलने पर जिले के कलेक्टर अबिनाश मिश्रा स्वयं शकुन बाई के घर पहुंचे और उनकी खेती-किसानी के संबंध में बातचीत की।

उन्होंने शकुन बाई की सराहना करते हुए इसे जिले के अन्य किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बताया। इस अवसर पर शकुन बाई ने अपनी बाड़ी में उगाए गए मुनगा (सहजन) को भेंट स्वरूप प्रदान किया तथा पारंपरिक पत्तल-दोना में ‘माड़िया पेय’ से स्वागत किया। यह ग्रामीण संस्कृति और आत्मनिर्भरता का सुंदर उदाहरण रहा।

शकुन बाई की यह उपलब्धि दर्शाती है कि यदि किसान आधुनिक तकनीकों के साथ पारंपरिक ज्ञान का समन्वय करें, तो कम लागत में अधिक लाभ अर्जित किया जा सकता है। उनकी सफलता न केवल उनकी आर्थिक सुदृढ़ता का आधार बनी है, बल्कि क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी एक नई दिशा और प्रेरणा का स्रोत बनी है।

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