देश आजाद, क्या हम भी?

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देश आजाद, क्या हम भी?

तमाम उम्र बीत जाती है,
एक घर बनाने में,
तुम तरस नही खाते,
बस्तीयॉ जलाने में।

ये शेर मेरे बचपन में स्कूल के दिनों में 15 अगस्त के अवसर पर आयोजित प्रदर्शनी जो पुलिस ग्राऊंड, बिलासपुर में प्रदर्शनी में करीब चार दशक लिखा हुआ देखा था, लेकिन उस समय इसका अर्थ मुझे समझ नही आया वास्तव में जीवन के करीब पॉच दशक बाद भी इसका अर्थ पूर्णरूपेण समझ नही पाता हूँ यदि पूरा अर्थ समझ आ जाये तो जिंदगी मुकम्मल हो जायेगी, खासकर आज के हालात को देखकर न समझना बेहतर लग रहा है।

जिसका उल्लेख मैंने मुंशी प्रेंमचंद की कहानी कफन, गरीब बच्ची को अपने भाई की मौत का इंतजार और टॉयलेट में भोजन करता हुआ वेटर जिसका उल्लेख पिछले आर्टीकल में मैंने किया था। यही गरीबी मुफलिसी, अशिक्षा जाति व्यवस्था, चिकित्सा के अभाव में मौत, दिल को आज भी दहला देती है, कि देश के आजादी के बावजूद ये हालत क्यों है? इसी परिप्रेक्ष्य में मैं कहने के लिये मजबूर हो जाता हूँ, कि देश आजाद है लेकिन ऊंपर लिखी चीजो से हम आजाद हुये है यह कहना मुश्किल है।

आदमी तो एक रूम मे रहता है,
बाकी में तो उसका गुरूर रहता है।

आदमी दो, कमरे दर्जनो में
यह मुझे समझ में नही आता।

ऊपर में उल्लेखित गुरूर वास्तव मे ईगो है, जो सेल्फ याने ईगो का अहसास है, इसीलिये कहा जाता है

No Self (ego) नो सेल्फ (ईगो)
No Problem नो प्राब्लम
Have Self हेव सेल्फ (ईगो)
Problem ही Problem प्राब्लम ही प्राब्लम
यह Self सेल्फ की अहसास लेफ्ट ब्रेन कराता है।

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यकीनन हरेक घर में खासकर भारत वर्ष के धर्मावलंबी वाले घरो में या वास्तव में जो जीवन जीना चाहते है, जो धर्म, अधर्म, मानव जीवन का अस्तित्व महज शरीर नही है, या जहॉ भी कर्म के संबंध में बात होती है। वहा गीता या उनके कर्मग्रन्थ की बात भी होती है, एक ओर जहॉ यह गीता, महाभारत में कृष्ण, अर्जून के बीच के संवाद के संबंध में उल्लेखित है। ऋषि अष्टावक्र चक्र और राजा जनक के बीच के संवाद के संबंध वाली गीता अष्टावक्र चक्र गीता के बारे में कहुत कम लोगो को ज्ञान होगा। जिसमें यह उल्लेख है शरीर और मन दोनो को कर्म बंधक बनाये रखा है, लेकिन आत्मा कर्म बंधन से मुक्त है।

दोनों गीता का संदेश लगभग समान ही है। जो वास्तव में हमारी सोच को रूपांतरित करने वाली तो है ही साथ ही स्वयं के आंतरिक विकास में महती भूमिका अदा करता है।

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अष्टावक्र गीता के अनुसार मोक्ष का किसी लोकांतर गृह और स्थान ग्राम में निवास नही है, लेकिन अज्ञानरूपी ग्रंथि का नाश ही मोक्ष है।

जो प्राणी चैतन्य आत्मा में विश्राम कर स्थिर हो गया वही मुक्त है। सारे कर्म तन, मन (चित) के है। जो तन एवं मन के प्रति प्रेमभाव है वही बंधन है, आत्मा का कोई बंधन नही है।

जो मनुष्य अपने आपको आत्मा मानकर शरीर से अपना साथ तोड़ लेता है, वही मुक्त है। लेकिन यहॉ आजादी या मुक्ति का तात्पर्य गरीबी, मुफलिसी, साम्प्रदायिता, धार्मिक व बिमारी एवं अशिक्षा से है, क्या यह बदलाव इस सोच से संभव है।
हम अपने बारे में जितना नही जानते उससे ज्यादा बाहरी दुनियां यहा तक की चन्द्रयान के माध्यम से चॉद की यात्रा, मंगल की खोज के साथ पूरी दुनियां की खोज कर चुके है। लेकिन अपनी खुद की खोज आज तक नही कर पाये है, यह खोज है पूर्व व्यक्ति पैरडाईम के चार घटक शरीर, हृदय, दिमाग और आत्मा की जिसके माध्यम से हमारा संचालन होता है।
हर शरीर का बाहरी रूप से खुबसूरत, सुन्दर बनाने के लिये बहुत खर्च करते है। दिमाग को शरीर का राजा माना जाता है, अधिक आईक्यू वाले व्यक्ति को हम बुद्धिमान मानते है।

लेकिन आज समय पीक्यू, आईक्यू का नही है, यहा तक ईक्यू से आगे जा चुके है एसक्यू स्प्रिचुअल कोशंट का जमाना है। लोग धार्मिक तो होते है, हम अपनी पहचान के तौर पर हिन्दु, मुसलमान, सिख या ईसाई के तौर पर स्थापित कर चुके है न कि एक इंसान के तौर पर, नाही इंसानियत के तौर पर।
दिमाग के अवचेतन मन मे बैठा परम्परा, आस्था, प्रथा के आधार पर जीवन चला रहे है, तो कैसे कहूॅ कि हम आजाद है।

और अंत मे –

भारतीय परिपेक्ष्य में भारत वर्ष का निर्माण अखण्ड भारत के हिस्से से पाकिस्तान के उद्भव के साथ हुआ जो अंग्रेजों से गुलामी से मुक्ति के उपहार के तौर में प्राप्त हुआ, लेकिन दो देशो के बीच खीची गई लाईन ने जो स्थायी रूप से दर्द दिया है, उसका परिणाम बदस्तूर जारी है। इसका भुगतान आज भी हमारी सेना और सामान्य नागरिक के अलावा बॉडर के इस पार और उस पार बसने वाले एक ही परिवार के लोगों को पता है, कि मानवीय मूल्य या मानवता के ऊपर महज खीची गई लाईन कितनी भारी है और यह जख्म दिन प्रतिदिन गाढ़ी होकर समरसता को, भाईचारा को और अखण्डता को किस शक्ल में तारतार कर रही है।

खैर इसके बावजूद हरेक चीज को प्राप्त करने के लिए हमें उसका मूल्य चुकाना पड़ता है शायद आजादी के तौर पर जाति, भौगोलिक सीमाओ, बेगुनाहओं, नागरिक, सैनिक के मौत के तौर पर स्थायी जख्म जो मिली है। इसके सहारे ही जीना है, पडोसी तो बदला नही जा सकता बावजूद इसके मिली आजादी को जाया नही करना है। शायद यही वक्त की मांग है, और इसी आजादी को महफूज रखना हमारे व्यक्तिगत दायित्व। भारतीय नागरिक होने के नाते सर्वप्रथम हम पहले भारतीय बने उसे पश्चात ही हमारी दूसरी पहचान बने, तभी आजादी का महत्व है और यदि हम ऐसा कर लेते है तो गरीबी, अशिक्षा, स्वास्थ्य, असमानता, साम्प्रदायिक आदि मोर्चे पर भी आजाद हो सकते है वर्ना ……………….?

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