नारायणपुर में राजस्व सर्वेक्षण से बदली ग्रामीणों की तस्वीर

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नारायणपुर में राजस्व सर्वेक्षण से बदली ग्रामीणों की तस्वीर

रायपुर, 13 जुलाई 2026 : वर्षों से अपनी ही जमीन पर खेती करने वाले, लेकिन उसके वैधानिक स्वामित्व से वंचित ग्रामीणों के लिए नारायणपुर में चल रहा राजस्व सर्वेक्षण अभियान नई उम्मीद लेकर आया है। अब उनकी जमीन केवल खेत नहीं, बल्कि अधिकार, पहचान और विकास का आधार बन रही है। छत्तीसगढ़ शासन के राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग के निर्देश पर जिले के 246 असर्वेक्षित गांवों में तेजी से राजस्व सर्वेक्षण किया जा रहा है, जिससे हजारों ग्रामीण परिवारों को पहली बार वैधानिक भूमि अधिकार मिलने का रास्ता साफ हो रहा है।

इस अभियान के तहत अब तक हुच्चाकोट, गोर्रा, कुमगांव, हितुलवाड़, काडूलबेड़ा और मुरहापदर सहित छह गांवों का राजस्व सर्वेक्षण पूरा कर अंतिम अभिलेख तैयार किए जा चुके हैं। इन अभिलेखों को भुइयां पोर्टल पर अपलोड भी कर दिया गया है, जिससे भूमि संबंधी जानकारी डिजिटल रूप से सुरक्षित और पारदर्शी हो गई है। वहीं कोडोली, कुंदला और चिलपरस गांवों के अभिलेख भी अपलोड के लिए शासन को भेजे जा चुके हैं।

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जिले को 31 मार्च 2026 को नक्सल मुक्त घोषित किए जाने के बाद प्रशासन ने लंबे समय से विकास की मुख्यधारा से कटे दुर्गम गांवों में सर्वेक्षण कार्य को नई गति दी। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद राजस्व अमले ने ग्रामीणों के सहयोग से मसपी, मलमेटा, बड़ेकाल (कोंगे), दोड़गे (बोदुम), गोडाबेड़ा (मरसूलनापा), गोमे, कोंगे और बोगान सहित आठ गांवों में सफलतापूर्वक सर्वेक्षण पूरा किया। इन गांवों के सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़े नक्शा तैयार करने के लिए आईआईटी रुड़की भेजे गए हैं। नक्शा तैयार होने के बाद सत्यापन कर अंतिम अभिलेख शासन को भेजे जाएंगे।

इस पहल का सबसे बड़ा लाभ उन किसानों और ग्रामीण परिवारों को मिलेगा, जो वर्षों से अपनी जमीन पर खेती तो कर रहे थे, लेकिन उनके पास भूमि का कोई वैधानिक रिकॉर्ड नहीं था। भूमि का स्वामित्व प्रमाणित होने के बाद वे आसानी से किसान पंजीयन, धान उपार्जन, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना, किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी), खाद-बीज वितरण सहित विभिन्न शासकीय योजनाओं का लाभ प्राप्त कर सकेंगे। भूमि संबंधी विवादों में कमी आएगी और सरकारी सेवाओं तक उनकी पहुंच भी अधिक सरल होगी।

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राजस्व सर्वेक्षण अभियान केवल जमीन का रिकॉर्ड तैयार करने तक सीमित नहीं है। यह ग्रामीणों के सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण की मजबूत नींव भी बन रहा है। वैधानिक भूमि अधिकार मिलने से ग्रामीणों में आत्मविश्वास बढ़ा है और वे विकास की मुख्यधारा से तेजी से जुड़ रहे हैं। प्रशासन की यह पहल पारदर्शी, जवाबदेह और जनहितैषी शासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में सामने आई है।

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